कुछ वह पागल बना रहा था।

पास नहीं था कुछ उसके, फिर भी कुछ तो भुना रहा था।

जलते दिए की लौ को ही, बार बार बस बुझा रहा था।

मेरे कुछ कहने से पहले ही, हर बात वह सुझा रहा था।

अपनापन भी इतना लाया, बीते गम को भुला रहा था।

 बादल की उन तस्वीरों में, धुंधली यादें दिखा रहा था।

तन्हाई की उन रातों में, सपना साजन का दिखा रहा था।

कोरे कागज़ के पन्नों पर भी, लिखा हुआ है बता रहा था।

कुछ ऐसा क्रम बना रहा था, साजन का भ्रम दिखा रहा था।

बार बार ‘न’ कहने पर भी, अंतर्मन को झुला रहा था।

मुझको बातों में उलझाकर, शैतान को अन्दर सुला रहा था।

गीला अन्दर तक था, लेकिन बाहर सूखा दिखा रहा था।

कुछ मैं पागल बनीं रहा, कुछ वह पागल बना रहा था।

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