कल्प

सुरज चन्दा ना बदला,
पवन पुनर्नवा जहां-तहां।
हम बेरिआ वेरिया बदले उतने,
स्वप्न नये जब आते इतने।
कहां गवा वह आम महुअवा,
कहा गवा कटहरिया कटहल।
शीशम सेमल कहां-कहां,
बड़हल गूलर क पुष्प यहा।
अब तो केवल हरा भरा,
ऊसर नित दे दरस खरा।
अतरे-अतरे यहा बुढे बच्चे
बापू,बूढिया
गुठली देख खिसियात राजू ।
सरसो के खेतवा का रंग,
चपला के अधरन चमकल।
बदल गया! मंगल ना बदला।
खैले के चिन्ता केकरे,
स्वस्थ रहे की आस जेकरे।
जाड़ा अति दाऊरौले जाला,
कपड़ा पहिने के शौक गयल।
डाक्टर इहय कहत रहेन,
मिट्टी मे ना पाव पडए।
अलसी सरसो तन ना छूवे,
डराप्सी कय भरमार भयल॥

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