‘श्रृंगार’ में मुक्तक का प्रयास

१.
उनके केसुओं की लट शरीर की ठिठुरन बढ़ा देती है I
उनके क़दमों की आहट पाँव की थिरकन बढ़ा देती है I
अपने आप पर ही काबू नहीं अब मेरा कहीं यारों,
उनके प्यार की चाहत दिल की धड़कन बढ़ा देती है I

२.
दिल ने दिल को जान लिया नैना कजरारे कहते हैं I
तुमने मन से याद किया मौसम के इशारे कहते हैं I
बिन पिए नशा जो चढ़ा है दिल दे रहा गवाही हमें,
तस्वीर को तुमने चूमा है मदमस्त नज़ारे कहते हैं I
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सर्वाधिकार सुरक्षित — त्रुटि क्षमा हेतु प्रार्थी — गुरचरन मेहता

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