दीपक की अभिलाषा

यदि शिखा संग देती रहेगी सदा

प्रण हमारा तमस व्याप्त होगा नहीं

हो विरह की अगनी से प्रकाशित धरा

मिलन हो न हो तम घिरेगा  नहीं ,

बाँध दूंगा किरण -पाश  में मैं तमस

क्लान्त हो कर चली जायेगी शर्वरी

मांग लूँगा रवि से मैं उसकी विभा

पर तमाछान्न होने न दूंगा महि ,

यदि शिखा संग …………………….

तिमिर -पथ पर यदि मैं थक भी गया

प्रण हमारा कभी मैं रुकुंगा नहीं

छीन लेगी भी बातास मेरी शिखा

प्राण देदुँगा पर मैं बुझूंगा   नहीं

मांग दीप्ती उदथ से किरण -पुंज  आ

कर प्रकाशित धरा तम रहे  न कहीं

द्रप्त होते रहेंगे  दीप से दीप    यूँ

दीप्त होता रहूँगा निरंतर      यहीं .

यदि सिखा संग ……………………….

Leave a Reply