गीत, गंध और अंगारे

पचहत्तर का बूढ़ा हूँ,
बस्ती की सड़क-किनारे
ढेर बना कूड़ा हूँ ।

खट्टे-मीठे
तिक्त-कषाय
नमकीन अनुभवों की
सड़ती हुई कतरनों का
बड़ा-सा टीला हूँ,
ऊपर से रूखा-सूखा
भीतर से गीला हूँ।

रोज ही सुबह-शाम
वधुएँ-कुमारिकाएँ
सारे घर-आँगन का बुहारन
अँजुलि-अँजुलि डालकर
पोषित-वद्र्धित करती
जा रही हैं मेरी काया।

क्या-क्या नहीं है
इस उच्छिष्ट तन-मन में
धूल और राख
सब्जियों-फलों के
बीज और छिलके
अनाजों के दाने
पशुओं के अवशिष्ट चारे

और गोबर भी
बच्चों के मल-मूत्र के पोतड़े
गीता-रामायण और
बाल पोथियों के फटे पन्ने
दवा और प्रसाधन की
छोटी-बड़ी शीशियाँ
टूटे हारों के मोती और मूँगा ।

फाड़े गए असफल प्रेम-पत्रों की चिन्दियाँ ।
रति-पूजा-विसर्जन के बासी फूल-ये कंडोम
उग आए हैं कुकुरमुत्ते
लतर-चतर पसरे हैं
बीजांकुरों से नए लत्तर
फूलते और फलते ।
बेजान मत समझो,
बरखा और बहार में
मौज अभी ज़िन्दा है ।
अलबत्ता,
थूक-पीक छोड़ जाते हैं
मौज़-मस्तीवाले,
मैं तो मगन हूँ ।
कुत्तों की बात छोड़ो,
आदमी के पिल्ले भी
जब आ जाते हैं जवानी के सुरूर में
टाँग उठाकर तुर्री मार
छोड़ते हैं गर्म धार
मेरी थकी-हारी काया पर
और आजमाने अपने पंजों का जोर
नखों का पैनापन
भँमोड़ने लगते हैं
मेरे ढलते-गलते तन को,
फिर निकल जाते हैं अज्ञात दिशा में
किसी मादा की तलाश में ।
इस ढूह बनी काया के अंदर
बने हुए हैं बिल चूहों और छुछुंदरों के
ये ही हैं मेरे दिल के कोष्ठक
छिपे हैं इन्हीं में जीवन के रहस्य ।

लेकिन तुम कौन हो ?

कोई गँवई किसान नहीं,
पढ़े-लिखे शहरी भद्रलोक ।
फिर क्यों कोड़-कोड़
विखराने आए हो
मेरी इस चिरसंचित निधि को ?
क्या है मतलब?
ऐसा क्यों,
पागल भी तो नहीं हो,
ओ…, आ गई समझ में बात !
है ना यही बात?
निश्चय ही शहर से आए
कोई खोजी पत्रकार हो।
गंध लग गई है तुम्हें
मेरे दिल की इस परम गोपनीय चीज़ की,
नहीं दूँगा,
नहीं देता मैं,
आज तक देखने नहीं दिया किसी को
बाँस के चोंगे में बंद यह कागज का पुराना पुलिन्दा
सन् बयालीस की क्रांति के नारे
और गुप्त दस्तावेज-दहकते अंगारे
उसी अंगारे की ऊष्मा से अब भी गरम है मेरा दिल ।
एक नायाब चीज और
मेरी पहली प्रेमिका का
ख़ुशबू भरा पहला प्रेम-पत्र,
उसी सुगंध से मस्त
मैं आज भी
निशीथ के एकांत में
गा लेता-गुनगुना लेता हूँ
जिन्दा रहता हूँ।
मत छेड़ो मुझे यार!
ओ खोजी पत्रकार !!

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