मैं कोई बात कहूँ वो गलत समझता है

मैं कोई बात कहूँ वो गलत समझता है
वो मेरा यार मुझे अब अलग समझता है

तुम्हारी आँखों में पहली सी मोहब्बत न रही
नज़र की बात यहाँ बस जिगर समझता है

मोहब्बतों के सहारे ही दुनिया क़ायम है
ज़माना फिर क्यों इसे अब ज़हर समझता है

तेरी जफा का सितम सहके भी दीवाना हूँ
मुझे शहर का हर कोई अजब समझता है

यूँ दिल का हाल कभी मत किसी से कह ‘कुंदन’
हरेक शख्स इसे बस ग़ज़ल समझता है !!

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