आज मेरा फलादेश बिगड़ा है

आज मेरा फलादेश बिगड़ा है |
भाग्यांक में मिला प्रेम पंक पिंजड़ा है ||
नापता था गगन को भाँप में गृह चाल थी |
बिडम्बना है प्रेम की या ग्रहों ने रगड़ा है ||
आज मेरा फलादेश बिगड़ा है |

भावना औ ज्ञान में मचा हुआ झगड़ा है |
प्रेम प्रहार से हुआ ज्ञान जैसे लंगड़ा है ||
बाल्मीकी ध्यान है, गोस्वामी की आन है |
भर्तृहरि की शान को हम ने मन से पकड़ा है ||
आज मेरा फलादेश बिगड़ा है |

भूचाल ज्वाल जाल से क्या सुमेरु उखड़ा है ?
तूफ़ान तपन घन नाद से गगन नहीं उजड़ा है ||
बडवाग्नि सी भी तपन से सागर कभी सूखा नहीं |
खद्योत की लघु चमक ने क्या सूर्य तेज जकड़ा है ?
आज मेरा फलादेश बिगड़ा है |

ग्रहण में तो राहु दिखता भास्कर से तगड़ा है |
भाग्य, दैव ,कालनिर्णय तीन का ये तिकडा है ||
निश्तेज होता है ग्रहण में चन्द्रमा औ सूर्य भी |
प्रतीक्षा कर समय की यह दुर्दिनों का पचड़ा है ||
आज मेरा फलादेश बिगड़ा है |

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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