हम जानिला (निर्गुण)

 

मन हो तू जइबा हम जानी!
पाँच परग को बना है पिंजरा!
उसमे वस्त्र पुरानी!
एक जइहै प्रेम लहरिया!
डूब मरिबा बिन पानी!
काल कलंदर राजा जइहै!
रूप निरखत रानी!
वेद पढ़त पण्डित जइहै!
जइहै मुरख ज्ञानी!
मन हो तू जइबा हम जानी!
चार सखी मिल चलै बजारे!
एक से एक सयाने!
राम नाम कै टेर लगवनी!
पुण्य पाप दरवानी!
मन हो तू जइबा हम जानी!
चाँद सूरज दोनों चल जइहै!
जइहै पवन अ पानी!
कहै कबीर सुना भई साधौ!
रह जइहै मंगल क निशानी!
मन हो तू जइबा हम जानी॥

 

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