चेतना में वेदना

चेतना में वेदना के नाद का गर्जन |
भावना की धार से हुआ ज्ञान का कर्तन ||
पूज करके देव को हमनें ही ऊंचा कर दिया |
उच्चता मद में दिया है श्राप का तर्जन ||

भावना का पुष्प उनको था किया अर्पन |
रुधिर था वह ह्रदय का जिससे किया तर्पन ||
तृप्त फिर भी न हुए तो अब बचा है क्या ?
मेरा मन मेरा वचन सब कुछ बना दर्पन ||

देव बनना है सहज तप त्याग तो असिधार है |
असिधार पर जो गुजर जाये वो मनुज अवतार है ||
तू ब्यर्थ में क्यूँ खींझता ?जानकर भी मर्म को |
श्री राम भी बन बन भटकते ऐसा ये संसार है ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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