महलों की ना बात करो

 

महलों की ना बात करो हम झोपड़ियों में रहते हैं

फूलों की ना बात करो काँटों की चुभन हम सहते हैं

 

लूट गए कलियों की खुशबू और बहार बसंती भी

अम्बर की ना बात करो हम तो धरती पर रहते हैं

 

पीड़ाएं उपहार मिली है सुख दुख की इस वस्ती में

चंदा की ना बात करो सूरज की धूप हम सहते हैं

 

उनको डर है पिघल न जाए मोम सा तन अंगारों से

हम तो जल कर तेज आग में सदा चमकते रहते हैं

 

गरल हमेशा पी लेते हैं दान सुधा कर देते हैं

‘सुधाकर’ को पीड़ाओं का राजकुँअर सब कहते हैं.

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