आदमी अब जानवर से भी

 

आदमी अब जानवर से भी है बदतर हो गया

आदमीयत भीड़ में जाने कहाँ है खो गया

 

आदमी के रूप में अब घूमता है भेड़िया

जानवर का बीज है अब कौन सहसा वो गया

 

आदमी अब बँट गया है धर्म भाषा जाति में

खंजरों की धार को अपने लहु से धो गया

 

आदमी और आदमी के बीच का यह फासला

जादुगर के जादू सा आँखों से देखा हो गया

 

आदमी तो है वही पर आदमी है वह नहीं

‘सुधाकर’ यह देख कर अब भाव विह्नल हो गया.

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