धूप में मोम सा वो

 

धूप में मोम सा वो पिघल जाते हैं

आग में जल के भी हम निकल जाते हैं

 

वो रात भर चाँद से माँगते चाँदनी

बन सुबह का सूरज हम निकल जाते हैं

 

उनको आशा है माँझी के पतवार का

तैरकर हम लहर में निकल जाते हैं

 

जो जनमा है लाखों मुसीबत में हीं

देख तूफान को ना दहल पाते हैं

 

‘सुधाकर’ में तो आभा सूरज का हीं है

इसलिए इनको हमदम सुफल पाते हैं.

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