अब हाथ न फैलाओ

 

अब हाथ न फैलाओ अपने हक के वास्ते

इसे मुट्ठियां बनाओं तो खुल जाएं रास्ते

 

होठों पर इन्कलाब हो करने को कुछ अरमान

मंजिल करीब आए हैं राही के वास्ते

 

दिल में दहकते हैं जहाँ जुल्मों दमन के आग

घावों पर मरहम भर दो रोको हो न हादशे

 

अब वक्त को स्याही से नहीं खूं से लिखो यार

शोषण दमन जीवन मरण और हक के दास्ते

 

कहता है ‘सुधाकर’ जहाँ मिलता न तेरा हक

बन जाओ इन्कालाबी माँगो इन्कलाब से.

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