यही है सच

 

यही है सच कि हम तो चले जायेंगे

मेरे ये गीत ग़ज़ल लोग गुनगुनायेंगे

 

मेरी ग़ज़ल नहीं है कोठे और महलों की

इसको तो खेत खलिहानों में पायेंगे

 

मेरी ग़ज़ल गाँव गलियों में रहती है

इसको तो झोंपड़ी दलानों में पायेंगे

 

हमने जनम दिया कविता व ग़ज़ल गीतों को

इसकी लावण्यता तो आप ही बतलायेंगे

 

मुझको दुष्यन्त रंग, मीर आदि मत कहना

हम तो ‘सुधाकर’ हैं सुधाकर ही रह जाएंगे.

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  1. Dr Jai 03/11/2013

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