दोस्त दुश्मन बन के

दोस्त दुश्मन बन के मेरे दिल में डाका दे गया

खंजरों से काढ़ कर मेरा कलेजा ले गया

 

रौंद डाला दोस्ती के बाग के सब फूल को

खिल रहे मधुमास में पतझड़ का मौसम दे गया

 

ढह गए दीवार दोस्ती के पुराने टूट कर

ईंट जो विखरे भी थे उसको भी ढो कर ले गया

 

दोस्त ऐसे से भला दुश्मन जमाने का कहीं

मेरे मन की गंगा में हृदय का काजल धो गया

 

दोस्त बन कर ‘सुधाकर’ तो चाँदनी देता रहा

पर अमावस का अंधेरा दोस्त दुश्मन दे गया.

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