इन मजलूमों की बस्ती में

 

इन मजलूमों की बस्ती में एक बीज क्रांति का बोना है

जो खून चूस कर जीता है उसका हीं लहू तो पीना है

 

जो हमको कहता राढ़, रेयान, नउआ, धोबी, कोइरी, कहार

उस सामंती का सोच बदल जो मैल है उसको धोना है

 

जो कहवाता कि मालिक हैं पूर्वज थे हमरे जमींदार

जो भूमि हरण कर बैठा है वो भूमि तो वापस होना है

 

है सबसे धूर्त चतुर समझे झूठा लूच्चा जुर्मी मक्कार

अपनी हीं गलती पर उसको एक न एक दिन रोना है

 

लेा ‘सुधाकर’ की बात सुनो इतिहास बनाना हम जानें

इस‘लाल’ के आगे सुनो लाल तुम ठहरे एक खिलौना है.

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