हमीं को मारने को

 

हमीं को मारनें को हम से, हथियार मांगते हैं

करने को वार हम पर तलवार माँगते हैं

 

नकली लगा के चेहरा कहते कि हम हैं अपने

नफरत का बीज वो कर अब प्यार मांगते हैं

 

करते हैं वार छिप के कोई न उनको जाने

जब घिर गए अकेले तब हार मानते हैं

 

बैठे हैं पालकी में दुल्हा का सेहरा बाँधे

जब छूट गए अकेले कहार मांगते हैं

 

है ‘सुधाकर’ के दिल में दुष्मन वो दोस्त बन के

मेरी  छपी ये ग़ज़लें अकबार मांगते हैं.

Leave a Reply