आँखों के समन्दर में

 

आँखों के समदर में तूफान हैं आंसू

खुशियां और कभी गम के पैगाम हैं आँसू

 

नयनों की नदी में सुख-दुख दो कोर किनारे हैं

जीवन के अविरल पथ में सुबह शाम हैं आँसू

 

पी-पीकर तीखापन सींचा है बाग चमन

मकरन्द मधु और सुरभि मुस्कान हैं आँसू

 

जो बरस गए धन मन के निर्मल नभ का है आँगन

धरती के हरे हृदय के अरमान हैं आँसू

 

सुख दुख में रो हँस कर जब भर जाती हैं आँखें

तब ‘सुधाकर’ के मन के सब बयान हैं आँसू.

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