राजेन्द्र जी को श्रद्धान्जलि

एक सुबह
सब कुछ मौन था।

दूर कहीँ
एक हल्की सी
प्रश्नगूँज थी-

“छोटे-छोटे ताजमहल’ का
इस तरह
अचनाक से ‘टूटना’?”

‘किनारे से किनारे तक’
निस्तब्धता मेँ
गूँजती
हर नयी कहानियोँ मेँ
‘आवाज तेरी है’

और
‘मुड़-मुड़ के देखता हूँ’

हर ओर दिखा
वही
‘अनदेखा अनजाना पल’

जाने कहाँ
खो गयी वो
‘एक इंच मुस्कान’

उम्र भर खेलकर
‘शह और मात’ का खेल

छोड़ गया ‘सीगल’
‘चेरी का बगीचा’

उड़ चला ‘हंस’
छोड़कर
‘सारा आकाश’।

शुभम् श्रीवास्तव ‘ओम’

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