मंथन

क्यूँ मुक्त नहीं होती ऐ धरा ,

आओ बैठें  हम सोंचे जरा ;

क्या कायर हूँ या शक्तिहीन ,

क्या भिखमंगे या दुखी -दीं न ;

क्या अश्त्र नहीं या शश्त्र  नहीं,

या अब वीरो का रक्त   नहीं ;

क्या वीरों से ख़ाली है देश ,

या कायर पहने वीर वेष ;

बन गया मरुस्थल आज देश ,

क्या नहीं रहे अब वीर शेष ;

अपमान हुआ सम्मान  हुआ,

इसका भी हमको नहीं बोध ;

कब तक मृत वत पाषण रहूँ ,

सहकर  कष्टों  को मौन रहूँ ;

अब उठो और हुंकार  करो ,

पांचजन्य उठा शंखनाद करो ;

तू अर्जुन है गांडीव      उठा ,

संधान करो और शत्रु  गिरा ;

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