बदलाव

बदलाव

अबोध-मासूम

निश्छल-नव सृष्टा

खेल-खेल में

घरोंदे बनाता,सृजन करता ।

अज्ञात भाव से

टहनी रोपता

हरियाली हित

पानी देता,रखवाली करता ।

गुड्डे की शादी करता

शहनाई बजाता

लकड़ी की रेल

कागज़ के ज़हाज़ बनाता ।

प्रगति पथ पर

कदम बढाता

खुशियों संग

सृजन चाहता ।

सुमंगल चाह्ता ।

मगर अब

अपना बसाने को

बेघर करता जमाने को ।

ज्ञात भाव से

कांटे बो कर

मूल रोंदता ।

खुशियाँ लूटकर

शहनाई तोड़ता ।

स्वार्थ की रेल

ज़ंगी ज़हाज़ उड़ाता ।

विकास के नाम पर

बारूद बिछाता ।

आतंक बिछाता ।

और

अस्तित्व बोध

उत्थान लिप्सा में

सृजन मिट्टी से

विध्वंस उगाता ।

विनाश बांटता ।

सर्वनाश बंटता ।

 

 

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