मैं क्यों अबला ?

मैं क्यों अबला ?

 

मैं क्यों अबला ?

मैं तो सबला नार,

मेरी ही पीठ पर

सब कंधों का भार।

गोबर, कण्डे, मवेशी, घास

चूल्हा-चाकी, जठर-आस

सुहाग, व्रत, त्योहार

मरद की दारू व मार

सास ननद के टूणे

दुख बढाते दूणे

ससुर की फटकार

रूठना भी,नहीं अधिकार

चाहे खुद रहे बेहाल

सभी की सार-संभाल

मदन क्रीड़ा

प्रसव पीड़ा

जवान होती छोरी

मनचलों की चिरौरी

छोरे का बस्ता

रसोई हाल खस्ता

सब के सब, मगर

लदे मेरी पीठ पर

सुशीला, सुहागिन नाम पर

कभी गृहस्थी के आधार पर

सहकर सतत दुत्कार

बनी मैं सक्षम नार ।

 

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  1. Santosh Gulati 31/10/2013

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