मेरे १०१ हाइकू

मेरे १०१ हाइकू

घास रोदन
दुबारा अंकुरण
जिजिविशा है ।

ताकते मोर
आच्छादित गगन
कब वर्षा हो।

बनाता घर
मिट्टी द्वारा अबोध
एक सृजन।

उन्हें ताकता
ठेला खींचता बच्चा
जो कारों मैं हैं।

ये फुटपाथ
मेरा आश्रय स्थल
कहे अनाथ।

एक टांग से
बगुले की प्रतीक्षा
तप ही तो है।

उठता धुआँ
उजड़े घर कहें
आतंक कथा।

माता-पिता का
मात्र छणिक स्वार्थ
जन्मता बच्चे।


तेरी शक्ल का
सच्चा प्रतिबिम्ब हूँ
कहे दर्पण।
१०
कहें कहानी
उजड़े आशियां की
ये खण्डहर।
११
झूठे दौनों की
प्रतीक्षा में ताकते
भिखारी बच्चे।
१२
नव-पल्लव
पूछे जन्म का राज
एक जिज्ञासा।
१३
स्वप्न देखता
कारीगर अपने
आशियाने का।
१४
स्वदेश में भी
विदेशी बन कर
हम रहते।
१५
कसने से ही
मीठे स्वर देता है
वीणा का तार।
१६
पर-सुख से
दु:खी आज मानव
न स्व दु:ख से।

 

१७
किससे कहूँ
मेहनत का दर्द
मज़दूर हूँ।
१८
पानी पर ही
बरसे खूब पानी
देख नादानी ?

१९
पेट हेतु भी
होना पड़ा पेट से
धिक्‌ रे जीवन !
२०
लेखन देख
कांपता पेड़, सोचे
अब कटूंगा ।
२१
दे कर दर्द
बांटते मरहम
मेरे मसीहा ?

२२
मत उलीचो
अंधेरा बाल्टियों से
दीप जलाओ ।

 

२३
बचपन में
लड़े मेरी है मेरी
अब माँ तेरी ।
२४
कर देख लो
गुड़ चींटी का मेल
आज की दोस्ती |
२५
नभ को ताक
अकाल में, बरसा
मन मेघ सा ।
२६
खींच लकीरें
धरा पर स्वार्थ की
बनाते देश ।
२७
बरसे मेघ
जो घन-घना कर
मचला मन।
२८
जो तू चाहता
आवागमन मुक्ति
निज को जान ।

२९
आसमान में
उड़ जितना चाहे
ना भूल जमीं ।

 

३०
रह के साथ
जगत भीड़ में भी
हम अकेले ।
३१
घट में सांई
बाहर क्यों भटके
कर साधना ।
३२
घोल ज़हर
बांटते दीन-देश
सयाने लोग ।
३३
अयाने लोग
सयानों की सलाह
क्त्लो-गारत ।
३४
सबसे बड़ी
नेमत है खुदा की
खेलते बच्चे ।

३५
आना उनका
कुरेद गया ज़ख्म
मन की पीड़ ।
३६
पूँछ से नहीं
सींग से रोका जाता
वक्त का घोड़ा ।
३७
दिल में दया
आँखों में जो हो हया
जग तुम्हारा ।
३८
परदेश में
व्यवहार ही होता
अपना साथी ।
३९
दर्प शिकन
कर देती है बयां
मन की व्यथा ।
४०
दिल का राज़
बतलाती जग को
चंचल आँखें ।
४१
वक्त की मार
ताड़का सी दीखे है
मैनका मेरी ।
४२
दिल के जख़्म
कुरेद कलम से
बनाता छन्द ।
४३
माया मोह में
कैसे परखें सत्य
गुरु ही जानें ।
४४
शीश दिए भी
जो मिले सतगुरू
सस्ता ही जान ।
४५
उगता रहा
पेट निमित्त पेट
कथा गरीबी ।

४६
डाँट के अम्मा
चुपके से माँगती
दुआ खुदा से ।
४७
लुटे जाने से
जो मना किया मैंने
बागी कहाया ।
४८
डाँटे तब भी
छुपा के आँचल में
दुलारती माँ ।
४९
हित अहित
जानवर भी जानें
तू सत्य जान ।
५०
कल था कल
कल आएगा कल
आज की सोच।
५१
है घट ही में
बाहर सब ढूँढें
उलटी रीत ।
५२
माँग तू ऐसा
उस बाद ना पड़े
कभी माँगना ।
५३
जिसको ध्यावें
हरि-हर-विरंची
घट में तेरे ।

५४
मन बौराए
चहुँदिश असीम
बचा न कोय ।
५५
मूक है ज्ञानी
बतावें जो अज्ञानी
बात अगम्य ।
५६
स्वर्ग त्याग
कबीर ने तो चाही
साध संगत ।
५७
गुण के ग्राही
कवि-कामी व चोर
स्वर्ण ही खोजें ।
५८
दंभ-भ्रम का
अहं चढा रज पे
हो गई मिट्टी ।
५९
शुभ के लिए
रास्ता देने राम को
शिला भी तैरीं ।
६०
सृश्टि पालता
सर्वस्व त्याग कर
पिता सा पेड़ ।
६१
अथ-अद्यापि
निज खो कर पाले
निस्वार्थी पेड़ ।
६२
फले ज्यों नत
शालीनता पेड़ की
हम भी सीखें |
६३
देव दुर्लभ
नर तन पाकर
अब खोना क्यों ?
६४

खर्च के श्वांस
जीव ने जोड़ी माया
साथ ना चली ।
६५
सुला बाँहों में
आँख खुलें तो उठा
ना, तो दफ़ना ।

 

६६
भाव सारंग
सृजन, अभिव्यक्ति
निज की भाषा ।
६७
साधना, शक्ति
अंतस पीड़ा-लास्य
बांचती भाषा ।

६८
नत नयन
श्रांत, मुदित मुस्कान
मन की भाषा ।
६९
आँख अंगार
तन-मन भंगार
भाषा ही तो है ।

७०

मेरे गुनाह
रहमत से रोज़
बख्शता रब |
७१
ओंकार जन्मा
सर्वजन की भाषा
हमारी हिन्दी \
७२
हिन्द में हिन्दी
अभी भी पराई सी
शर्म की बात ।
७३
मन की पीड़
अपनों का दुराव
बिलखे हिन्दी ।
७४
हिन्दी मेरी माँ
लोरी, सीख,आषीश
कृतार्थ मैं ।
७५
सब को साधे
एक सूत्र में बाँधे
सक्षम हिन्दी ।

७६
हाड़ ना मांस
जिजीविषा ही साथ
व्यथा गरीबी ।
७७
पेड़ों को काट
बना कागज़, लिखें
पेड़ बचाओ ।
७८
जूझ में जीता
आराम से मरता
श्रम सीकर ।
७९
मांगने न्याय
फ़ूंकते राज निधि
हम सजग ।
८०
मंच मुखौटे
नेपथ्य में चेहरे
जन भ्रमित।
८१
रेंगते चले
जीवन काँधे लाद
हम बंजारे।
८२
दवा के साथ
सलाह देती बेटी
लगे माँ जैसी ।
८३
आतिश नहीं
बारूद बन बैठा
मेरा शहर ।
८४

मन के मान
जिश्म के तमाशों में
प्यासी है रूह ।
८५
खबर बनी
देश की खुशहाली
वादों में कैद ।

८६
सहते जाना
कंगूरी अट्टहास
नींव का मर्ज ।
८७
मन बुद्धि का
प्रपंच परिणाम
अस्तित्व बोध ।

८८
ओस की बूँद
धरा धानी चुनर
मोती से जड़े ।
८९
बच्चे जो हंसे
मन आंगन हुआ
इन्द्रधनुष ।
९०
भोर की लाली
दिवस अंकुरण
ओस की बूंद ।

९१
सतत द्वंद्व
बाहर व भीतर
सभी हैं हारे ।
९२
निरभ्र नभ
दावानल सा खिला
पलास वन ।
९३
सितारे टांगे
गगन की झूमर
उल्टी लटकी ।
९४
तारों की सेज़
रात की अंगड़ाई
जन्मा सूरज ।
९५
प्राची प्रसव
उषा मंगल गान
गाओ बधाई ।
९६
शाब्दिक भ्रम
सच, झूठ, ईमान
तोता रटंत ।
९७
खिला यौवन
बौराई तितलियां
इश्क बेकाबू ।
९८
चटकी कली
भौंरे हुए बेकाबू
नेह निकम्मा ।
९९
जल विधान
संहार से सृजन
बादल राग ।
१००
अंतर द्वन्द्व
जीत कर भी हार
महाभारत ।
१०१
चैन से सोती
उल्टी टंगी वल्गल
रीत अपनी ।

 

 

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