सम्रथाई का अंग

जिसहि न कोई तिसहि तू, जिस तू तिस ब कोइ ।
दरिगह तेरी सांईयां , ना मरूम कोइ होइ ॥1॥

भावार्थ – जिसका कहीं भी कोई सहारा नहीं, उसका एक तू ही सहारा है । जिसका तू हो गया, उससे सभी नाता जोड़ लेते हैं साईं ! तेरी दरगाह से, जो भी वहाँ पहुँचा, वह महरूम नहीं हुआ , सभी को आश्रय मिला ।

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ ॥2॥

भावार्थ – समंदरों की स्याही बना लूं और सारे ही वृक्षों की लेखनी, और कागज का काम लूँ सारी धरती से, तब भी हरि के अनन्त गुणों को लिखा नहीं जा सकेगा ।

अबरन कौं का बरनिये, मोपै लख्या न जाइ ।
अपना बाना वाहिया, कहि कहि थाके माइ ॥3॥

भावार्थ – उसका क्या वर्णन किया जाय, जो कि वर्णन से बाहर है ? मैं उसे कैसे देखूँ वह आँख ही नहीं देखने की । सबने अपना-अपना ही बाना पहनाया उसे, और कह-कहकर थक गया उनका अन्तर ।

झल बावैं झल दाहिनैं, झलहि माहिं व्यौहार ।
आगैं पीछैं झलमई, राखैं सिरजन हार ॥4॥

भावार्थ – झाल(ज्वाला) बाईं ओर जल रही है, और दाहिनी ओर भी, लपटों ने घेर लिया है दुनियाँ के सारे ही व्यवहार को । जहाँ तक नजर जाती है, जलती और उठती हुई लपटें ही दिखाई देती हैं । इस ज्वाला में से एक मेरा सिरजनहार ही निकालकर बचा सकता है ।

सांई मेरा बाणियां, सहजि करै ब्यौपार ।
बिन डांडी बिन पालड़ैं, तोले सब संसार ॥5॥

भावार्थ – ऐसा बनिया है मेरा स्वामी, जिसका व्यापार सहज ही चल रहा है । उसकी तराजू में न तो डांडी है और न पलड़े फिर भी वह सारे संसार को तौल रहा है, सबको न्याय दे रहा है ।

साईं सूं सब होत है, बंदै थैं कुछ नाहिं ।
राईं थैं परबत कषै, परबत राई माहिं ॥6॥

भावार्थ – स्वामी ही मेरा समर्थ है, वह सब कुछ कर सकता है उसके इस बन्दे से कुछ भी नहीं होने का ।वह राई से पर्वत कर देता है और उसके इशारे से पर्वत भी राई में समा जाता है ।

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