नाम की तख्ती

नाम की तख्ती

 

 

मैं था

निर्मल कोमल

रंगहीन गंधहीन

निरापद निर्भय

बेनाम मदहीन

क्या था?

मालूम नहीं

किन्तु मैं

’मैं’ नहीं था।

आँखें खुलीं ही थीं

कि

कई रंगों के छींटे

बदन पर टंगे देखे

जकड़ दिए गए हाथ,कान,गर्दन

बाँध दिए गए पैर

आज मैं

’मैं’ नहीं रहा,

देश-धर्म,कुल-कुटुम्ब हूँ मैं।

रंग कुटुम्ब की आब

जिजीविषा खुमारी

हठ और हुनर आते गए

मैं मिलता गया

और ’मैं’ ही बढता गया

और

निज खो कर

अपनत्व भूल कर

मात्र नाम की तख्ती

बनता गया मैं।

अब

निजत्व ढूँढने

खुद को खोजने

’मैं’ मिटाना चाहता हूँ

और

फिर से बनना चाहता हूँ

वही रंगहीन गंधहीन

निरापद-अनजान।

 

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