ललकार

अब रहा नहीं है धैर्य मुझे ,

हैं फड़क रही बाहें मेरी

अब सहन नहीं होती पीड़ा

हे जन्म भूमि जननी तेरी …..

अब मस्तक पर तू लगा तिलक

आशीर्वाद विजयी भव  दे

अब कांप ऊठे ब्रम्हांड   सारा

हे जननी इतनी शक्ति   दे ……

प्रतिशोध के दावानल  में जल

उश्ड रक्त उदिग्नित      है

फट रही शिराएँ   हैं   मेरी

अब  शत्रु  मृत्यु  से वंचित  है……..

इतिहास साछी  है इसका

जब -जब विपदा   माँ पर आयी

सर  कटा दिए  पर झुके   नहीं

गौरव  की गाथा  फिर   गयी …..

हम उन   मानस की  सन्तति   है

बलिदान  देश  पर  हो   जाते

किंचित  भी भय का बोध  नहीं

हम हँसते -हँसते  मिट जाते ……

परहित के कष्ट निवारण   में

हम गरल पान  भी  करते   है

वसुदेव  कुटुम्बकम का विचार

मन वचन  कर्म में  रखते हैं …

छल कपट   हमारी प्रकृति  नहीं

न द्वेष  राग  में   रहते    हैं

मन     में  अभिमान नहीं रहता

हम स्वाभिमान  से   जीते   हैं .

 

2 Comments

    • dr.pradeep k tripathi UTPAL 26/10/2013

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