पर्व

रंग-भूमि यह कर्म-भूमि है|
देव-भूमि यह तपस-भूमि है|
अतीव-सुन्दर भरत-भूमि यह,
मातृ-भूमि है, पर्व-भूमि है||१||

जीवन में हैं जितने रंग|
सब मिलते पर्वों के संग|
कहीं हंसी है, कहीं भाव है,
कहीं समर्पण औ सत्संग||२||

कभी पर्व जैसे आराधन,
जन-गण मिलकर गायें वन्दन|
माता और देवता पूजन,
से जग महके जैसे चन्दन||३||

प्रेम ठिठोली की है होली|
दीपोत्सव दीपों के टोली|
रक्षा-बन्धन, विजया-दशमी,
सब में एक प्रेम की बोली||४||

आओ सबको गले लगा लें|
मिल-जुल सारे पर्व मना लें|
अंधियारा मन का मिट जाए,
मन में प्रेम का दिया जला लें||५||

–दीपक श्रीवास्तव

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