मंज़र तबाही का

मंज़र तबाही का

यह कैसा मंज़र है, यह कैसी तबाही है;
यह मौत और जिंदगी में, कैसी रुसवाई है।
मौत ने जिंदगी को, क्या सिला दिया;
बसंत आया भी नही, पतझड़ बना दिया।
मौत के सौदागरों का यह क्या बखेड़ा है,
हर गली, हर मोड़ पर, बस, इनका ही डेरा है।
बिक रही है जिंदगी, मौत के हाथों   में ;
ग़मज़दा हैं सभी, ख़ौफ के सन्नाटों में।
बुझ रहे हैं चिराग सभी, अरमानो की शाम ढले;
कहीं हो रहा इंतजार किसी का,
कहीं किसी का जनाज़ा उठे।

फूलों के पौधों को सांपों ने घेरा है;
ज़हर ही ज़हर है चारों ओर, अंधेरा ही अंधेरा हैं।
नशे का बाजार गर्म हो रहा है;
जवान तबका मदहोश हो रहा है।
जिंदगी को दीमक लग ही चुका है;
बस, तमाशा-ए-बर्बादी शुरू हो रहा है।
गांजा, चरस, गोली, शराब;
सब की बोली लग रही है;
जिंदगी बिक रही बेहिसाब ।
कहीं किसी की गोद सूनी हो रही;
तो किसी का सिंदूर मिट रहा है।
कहीं राखी लिये, कोई किये हैं इंतजार,
तो कोई यतीम हो रहा है।

अब कभी सुबह न होगी, न कभी आयेगी बहार;
सूना हो जायेगा आंगन, सिर्फ रह जायेगी याद।
तस्वीर पर लगा होगा फूलों का हार;
जो दिलायेगा याद हरदम;
मौत की जीत,
जिंदगी की हार।

मौत के सौदागरों का अब,
चल पड़ा नशे का बाजार;
या रब,
अब तेरे हवाले है;
मुल्क की जवान नस्ले-औलाद।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

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