हसरतों की मज़ार

हसरतों की मज़ार

मैं खुद ही मांझी, मैं खुद ही था खिवैया,
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब रही है नैया।
हसरतों का सामान लेकर चली थी नैया,
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब रही है नैया।

बड़ी उम्मीदों से उसको पाला, बड़ी चाहतों से चाहा;
दुलारा था वह सारे घर का, नशे की लत्त ने उसे बिगाड़ा;
समझाया उसे मैने बहुत, पर वह न माना,
मिन्नतें करती रही उसकी मैया,
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब रही है नैया।

उम्मीदें थीं उससे बहुत सी, हसरतों का सामान भी था भारी;
नशे की आदतों का, उसने भी सामान रख दिया।
उम्मीदें सब रह गईं धरी,
जवान बेटा कब दुल्हन लायेगा,
कब दादा मुझे बनायेगा;
बना दिया था महल शीशे का उसका,
आज पत्थर उसी ने मारा।
नशे ने जीवन उसका ऐसे बिगाड़ा,
बन कर पतवार मेरी;
खुद तो डूबा,
मेरी भी डुबो दी नैया,
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब रही है नैया।

नशे के भंवर का पता न था, पतवार पर था मुझे भरोसा;
भंवर ने पतवार ही तोड़ डाली, डुबो दी मेरी नैया।
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब रही है नैया।
बेटा है वह मेरा,
जिसकी लाश पड़ी है;
बेटा था वह मेरा,
हसरतें जिससे मेरी सजी थी;
हसरतों की मेरी अब लाश रह गई है,
साहिल से देखता हूं, मज़ार अपनी हसरतों का।
मेरे सामने ही देखो, मेरी डूब चुकी  है  नैया।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

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