छोटा सा ही तो ज़ाम था

छोटा सा ही तो ज़ाम था

क्या दिल ने समझा है, क्या दिमाग ने जाना है,
नसीब  में   हम नशेबाजों की, ठोकर ही खाना है।
सोचा भी न था हमने, कभी हाल अपना होगा ऐसा,
सिर्फ छोटा सा ही तो जाम था,  मुँह  से लगा बैठा।
कम्बख्त, ऐसा चढ़ा जुनून, कि,
न दीन की, न दुनिया की रही खबर मुझको,
कभी इधर गिरा, कभी उधर गिरा, मैं जिधर गिरा,
बस जाम पे जाम चढ़ा बैठा।
सिर्फ छोटा सा ही तो जाम था,  मुँह  से लगा बैठा।
दोस्तों ने खिला दी कस्में;
महफिल से मत उठ, अभी तो बाकी है रस्में;
अभी जो पी, हलक से उतरी भी नहीं;
अभी तो ताश भी है बाकी, दो चार हाथ हो जाय;
अभी तो रात भी है बाकी, अभी तो कमसिन की जवानी होगी;
कुछ और जाम हो जाय, तभी तो खून में रवानी होगी।
घर की फिक्र मत कर,
अग़र वो तेरे हैं, तो हम भी कोई गैर नहीं,
कई खेल एक साथ खेले हैं।
बस,… इतना ही मुझे याद रहा,
जब आँख खुली,
जेब तो जेब,
मंजर का बयाने-हाल करने के काबिल ही न रहा।
सिर थाम लिया इक आह भरी,
यक-ब-यक कह उठा,
’’ या अल्लाह यह मैं क्या कर बैठा’’
सिर्फ छोटा सा ही तो जाम था, मुँह से लगा बैठा।
इस दौर के बाद, कई दौर हमने फिर देखे,
कभी इक यार के घर, कभी दूजे यार के घर,
यूं हमने ज़ीनत-ए-फि़रदौस के भी कई दर देखे।
कभी साकी के हाथ में जाम,
कभी होठों पर अपने, उसके हाथ से जाम,
यूं जाम पे जाम चढ़ा बैठा,
आज खुद को बर्बाद कर बैठा।
अपनी गलतियों का सिला भी दें तो किसको;
अपना ही खामियाजा है, भुगतना ही पड़ा हमको।
नशे के सैलाब में डूबा,
जिंदगी के साहिल से किनारा कर बैठा।
सिर्फ छोटा सा ही तो जाम था,  मुँह  से लगा बैठा।

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