अंदाज़ नशे का

अंदाज़ नशे का

खून की बूंद से ज्यादा, कीमत, बूंद नशे की है,
अब जमाने को, रिश्ते निभाने की जरूरत क्या है ।

पत्ता पत्ता बूटा बूटा, देता है गवाही,
देखो उस फूल को, टूटा डाली से,
आज उसकी कीमत क्या है ।

बेमुरव्वत है इंसान, इंसान से तो मुहब्बत कर न सका;
नशे की बाहों का सहारा लिया, नशे ही को खुदा माना, मुहब्बत का ।

जब रकीब से की मुहब्बत, तो…
रफीक की जरूरत क्या है।
पढ़ लिख कर, इतनी तालीम लेकर, तुझको हासिल क्या हुआ।
आज नशे में धुत्त पड़ा है, खुद अपना ही कातिल आप हुआ।

नशा और बहाना, नये जमाने की रस्मों का,
धज्जियां उड़ा कर रख दी,
रिश्तों की, और, उनकी नस्लों का ।
खुद तो नशे में, और घर भर को नशे में नहला दिया,
अच्छा सिला दिया तूने  अपने बुजुर्गों की कसमों का ।

अब तेरी बीवी तुझपे आंखें क्यों न तरेरे,
या, तेरे ही बच्चे, करें तुझे नज़र-अंदाज़;
तू ही उन्हे, नई रौशनी में, ले आया,
सबका बदल रहा है अंदाज;
ये है नशे का अंदाज,
अब तुझे पछताने की जरूरत क्या है ।
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