मौत का सदका

मौत का सदका

आये थे इस जहान में सदका उतारने,
वह जा रहे हैं, देखो, शब-ए- ग़म गुज़ारके।
आये थे जिस जहान  में, वो मज़ार बन गया;
नशा ही नशा है हर तरफ, लाशों का  अबाँर  लग गया।
सोचा था, जन्नते-जहाँ में , रस्म-ए-जिंदगी निभायेंगें,
करेंगे शुक्र खुदा का,
बसायेंगे घर अपना, और ऐश करेंगे।
मिंयाँ बीवी की जिंदगी उलझन  में  फंस गई;
नशे की दख्ल अंदाज़ी, पूरे घर को दोज़ख कर गई।
गैर तो गैर अपनो को भी रकीब कर गई;
कमाई और कमाई की तबाही, नशे का रुख कर गई।
बीवी भी कैसे करती बर्दाश्त, जवानी अब भी जो ठहरी उसके साथ;
मिंयाँ की कमाई, बीवी मौज उड़ाती रही;
मिंयाँ कमाता, और खुद को नशे  में  डुबोता रहा;
देखता दुनिया का तमाशा, और खुद तमाशा बनता रहा।
बीवी बटोरती रही कमाई उसकी, अपनी अलग ही दुनिया बनाती रही।
सच ही कहा है;
मर्द; पचीस-चालीस,
लुगाई और कमाई; चालीस के बाद, उसकी ढलाई;
औरत; बीस-चालीस,
शादी-खाना आबादी; चालीस के बाद फिर जवानी आई।
बच्चों की कर ली परवरिश, और फिर से आज़ादी पाई।
सूरज के ढलने के बाद ही चाँद पर नूर आता है,
कुदरत के कानून  में  भी यही पाया जाता है।
चालीस के पार, बहार बीवी पर आई, और,…
शौहर की जवानी निकल गई,
करते रहे नशा, और….
जिंदगानी चली गई।
यूँ   उम्र काफी गुजर गई,
जिंदगी थी नियामते-खुदा,
नशे की भेंट चढ़ गई।
यह तो जहाने-फ़ानी है, फ़ना सबने होना है,
नशे के ज़हर से फ़ना होना, खुदा से बेईमानी है।
आज मिंया इस ज़न्नते-ज़हान से रुखसत हो रहे,
आये थे इस जहान में, हसरत थी इसका सदका  उतारेंगें,
सब कुछ हार के अपना,वह आज जा रहे हैं देखो,
मौत का सदका उतारके।

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