बचपन बीत गया

जिंदगी पे हसने के मौके बीत गए , चुकी वो बचपन बीत गया ,
रंगों में जीते सपने है बीत गए , चुकी वो वक़्त बीत गया .

नजरों पे नमी थी अक्सर, फिर भी था नजर घर ख़ुशी का ,
आज बसे हैं सभी नजर पे , बस है नहीं है तो वो घर ख़ुशी का .

साया था अपना हरपल अजीज ,बचपन में थी जो हमको तमीज,
हवाओं ने कुछ समेटा य़ू हमको, अब साया भी ना है अपने करीब.

वो तितली वो चिड़िया, और आँखों से कहती मेरी वो गुडिया,
वो पेड़ो का हिलना वो पत्तो का मचलना और परियों की दुनिया से हरपल गुजरना ,

वो कंचो की डिबिया , वो गिल्ली का डंडा ,वो शान से लहराता तिरंगे का झंडा ,
वो सकरी सी गलिया , वो ख्वाबो की तिलिया , वो बुढिया जो अक्सर बुझती पहेलिया ,
मिटाए नहीं मिटा सकेगा कोई, दिल में बसे इनकी निशानिया.

वो शेहेर बीत गया , वो नजर बीत गया , हमारा वो अपना सफ़र बीत गया ,
अब न राह है अपनी और न कदम है अपना,आज मंजिलो को छीनकर वो जहा बीत गया.

……………………………………………………………………………..नितेश सिंह(कुमार आदित्य)

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