नशे के गुलज़ार

नशे के गुलज़ार

बचपन, लड़कपन तुम दूर ही रहना, इन नशे के गुलज़ारों से;
यह कागज़ के फूल हैं, खुशबू नहीं इनकी फिज़ाओं  में ।

मिल रहा ख़ाक में बचपन, हो रही बर्बाद जवानी;
मौसम ने रूप बदला नशे का, चल पड़ी नशे की आंधी;
अब जाये  कहाँ ,  कहाँ  गुजारें, अपनी छोटी सी ये जिंदगानी।

नये जमाने ने करवट ऐसी बदली;
बदल गई तकदीरें, तदबीरें जमाने की;
पढ़ाई के आशियाने ने ले ली, अब जगह मयख़ाने की।

छोड़ पुस्तक किताबें, संग मदिरा के हो लिये।
पाठशाला ने मधुशाला, विद्यालय मदिरालय हो लिये;
अंदर पढ़ाई दिखती है, बाहर नशे की आग बिकती है।
नशे का बाजार चल रहा है,
दुकानों में पुस्तक किताबें नहीं, नशे का व्यापार चल रहा है।

जायेगा कहां अब बचपन का ये कारवा,
लड़कपन खड़ा है सामने,
जवानी हो रही जवान,
हर गली कूचे में, नशे की है धूम,
चरस,गांजा,शराब, बिक रहा सरेआम बेहिसाब।

बदला है ऐसा जमाना,
हर उम्र के लबों पर है, नशे का ही फसाना।
रस्ता दिखायेगा कौन अब, जब रहनुमा की नीयत ने भी,
बदल लिया चोला अपना पुराना।

डर है, नशे से, कहीं घिर न जाय, कारवां ये सारा।
बढे़ तो कैसे बढे़ आगे, ये कारवाँ,
लुट रहा है, रस्ते में ही
मौत न बन जाये, ये जिंदा  कारवां सारा।
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