मंजिल कहां

मंजिल कहां

कहां तेरी मंजिल, कहां है ठिकाना;
कहां भटक रहा है तू बचपन;
नशे  में  हो के दीवाना।
लड़कपन है सामने खड़ा;
जवानी ने है तुझ पर आना;
अभी से ही नशे का,
तू बन गया मस्ताना।

जेब खर्ची माँ-बाप से लेना,
और फिर पढ़ाई से आँख चुराना;
चरस,गांजा, का चस्का लगा,
आ गया तुझे भी सुट्टा लगाना।

बचपन अब भी चेत ले, होश  में  आजा,
यह नशा करा रही है तुझे,
चोरी, घर को लूटना,
और फिर मयख़ाना।

इसकी मंजिल का तुझे अंदाजा नहीं है;
अभी तुझे कोई, दुखों से पड़ा वास्ता नहीं है।
अभी तक तू माँ-बाप के लाड़ में था;
नशाखोरी की सजा की कीमत बड़ी है।
कभी अस्पताल, कभी पागलखाने,
तो कभी, जेल के लिये हथकड़ी है।
अब भी चेत ले, नादान,
अभी तो तेरी सारी जिंदगी पड़ी है।
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