महबूब की ईदी

महबूब की ईदी

निकलने को है चाँद ईद का, मुबारक की रात है,
सहरे-बहार आने को है, उसी का इंतज़ार है।

कब होगी फ़ज़र, मिलेगी ईदी, होगी मन की पूरी मुराद,
तोहफा हो मेरे खुदा का, दिल हो जाये मेरा दिलशाद।

इक तस्वीरे-जाना है मेरे दिल में, हो उसी से ईदे-मिलाद।
नमाज़ी चेहरा, नूरे-ईलाही हो,
रसूले-अल्लाह का नाम हो जिसकी पाक जुबां पर,
पर्दा-ए-हिजाब से रखती इत्तफाक़ हो,
सारे आसमां की कायनात, बकौल खुदा उसकी हिफाज़त करे;
बन्दी हो खुदा की, खुदा की बन्दगी में  रहे।
हुस्न उसका, ऐसा कि, खुद,
चाँद चैदहवीं का भी, अपनी  चाँदनी  की दुआ करे।
शबाब इतना कि, खुद,
चाँदनी भी, उसमे नहाने की तमन्ना करे ।

मगर:
जब, ज़हन में आता है सवाल, अपने मुक़द्दर पर शक आता है,
जब,
दुनिया  में  जलती हुई तहज़ीब का गुबार नजर आता है,
हर तरफ नशा और नंगा बाज़ार नज़र आता है,

तब,
ज़हन में बनी हुई तस्वीर की ताबीर पर, शक आता है।
ढूंढे से भी चाहूँ तो, वह मुजस्सिम  कहाँ  मिलती है,
भँवर मे फंसी कश्ती, साहिल से कहाँ  मिलती है,
तूफानों में जिंदगी को, पनाह  कहाँ  मिलती है,
ताज़ बनवाने का शौक़ तो लिये बैठा हूं;
मगर, मुमताज़  कहाँ  मिलती है।
ईद का  चाँद  तो नज़र आ गया,
मगर, अफ़सोस,
चाँदनी  पूनम  की नहीं मिलती है।
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  1. gopi 24/10/2013

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