हारती जिंदगी

हारती  जिंदगी

जि़ंदगी से जि़ंदा है, मगर, मौत का निशान लिये हुये;
पडे़ हुये हैं नशे में, हारती  जिंदगी का सामान लिये हुये।

मन के हारे हार है,मन के जीते जीत;
वह क्या जियेंगे  सुकूँ  से, लगा के नशे से प्रीत।
हार गया तू जिंदगी का जुआ बाजी नशे की लगाकर;
अब जाने का बांध रहा है सामान, अपना सब कुछ लुटाकर।

घर से गया, घरवालों से गया,
रिश्ते से गया, रिश्तेदारों से गया;
एक नशे को छोड़, सब कुछ तेरा गया;
जिसे तू चाहता था, उसकी चाहत से भी गया।

नशे की चाहत ने तुझे इतना दीवाना बनाया;
कि जवानी में भी बूढ़ा होता नजर आया।

नशे के शिकार हो, विकार है तुम्हारे दिमाग में  ;
शक-ओ-शुबह से घिरे हो, परेशां हो इस ज़हान से।
नशेबाज़ की बीवी से क्यों गिला, गिला क्यों कर उसके जज़्बात से,
आज तू खुद गिर चुका है, अपनी ही औकात से।
आज तेरा सब कुछ लुट चुका है, एक नशे को गले लगा कर;
देख रही दुनिया तमाशा, तेरी ही हँसी उड़ा कर,
जाओ, देख लो वह पड़ा है, नशे से अपना घर जला कर।

तू जिंदा है अब भी, इसलिये कि, देख सके अपनी ही चिता का मंजर,
तेरे आगे पीछे सब हो रहे इकठे , और  तू  मौत के बीच भंवर।
तेरा इनमें   अपना कोई नहीं है आज सामने,
तू बन के मुर्दा पड़ा हुआ है, मयखाने के दर के दर के सामने।
अब तेरा कुछ नहीं बाकी है
अब बस, रह गया है निशान, कंकाल तेरा,
हो गया ख़त्म, तेरा सामान,,
अब रूह निकलना बाकी है।
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