जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)

फटी-सी एक डायरी में,

लिख रखा है मैंने;

है पाई-पाई का तेरे,

हर जख्मों का हिसाब |

 

कब तूने तोड़ा दिल,

कब की थी रुसवाई;

कब हुई थी बेवफा,

हर तारीख है जनाब |

 

क्यों फोन का मेरे,

न दिया था जवाब,

भागती ही रही दूर,

ओढ़ नकली हिज़ाब |

 

पछताओगी एक दिन,

याद करोगी मुझको;

जब ढल जायेगा यौवन,

जब लगाओगी खिजाब |

 

वो मुस्कुराहट भी तेरी,

बेशर्मों-सी ही थी;

जब घुटनों के बल आके,

तुझे देता था गुलाब |

 

बस दोस्त कभी कहती,

कभी प्यार थी बनाती;

बिन पेंदी के लौटा का,

तुझे दूंगा मैं खिताब |

 

दुखाया है इस दिल को, 

तूने जाने कितनी बार;

आंसूं हैं दिए तूने,

मुझ गरीब को बेहिसाब |

 

झूठे तेरे प्रेम पत्र,

फेंक दिए हाँ मैंने;

कोई गिरा गंगा में,

कोई जा गिरा चिनाब |

 

कभी प्यार से की बातें,

कभी गोलियां जैसे बोली;

लहू-लुहान किया दिल को,

क्या तेरा भाई था कसाब ?

 

न हो तू यूँ बेताब,

तुझे मिल जायेगा जवाब;

जब छापूंगा ये किताब,

तेरे जख्मों का हिसाब |

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  1. Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 24/10/2013

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