बेबस परवाज़

बेबस परवाज़

’’आग लगी है पेड़ पर जल रहे हैं पात,
उड़ते क्यों नहीं पंछिया, जब पंख तुम्हारे पास’’।
नशा किया इसके फल का, अनजाने में आज;
बेर का पेड़ है या धतूरे का, पर नशा दे दिया आज।
नशा ही नशा, ऐसा असर, ऐसा कहर, अब होती नहीं परवाज़।
बचपन में है, पचपन पार जाना है, नशे से भरा जिंदगी का फसाना है;
जिंदगी के पाँव अभी से लड़खड़ा गये,
अभी तो जवानी ने आना है।
लड़कपन भी तो बाट जोह रहा है
अभी तो खाने खेलने के दिन है, अभी से नशे से  टांका   का जोड़ रहा है।
कक्षा  पांच  ही तो पढ़े थे, फिर अचानक, नशे का चस्का तुम्हे कैसे आ गया;
बचपन तू नशेबाज हो गया।
उम्र के बारह सावन बीते भी न थे;
काली घटा बन कर नशे के बादल, जीवन में तुम्हारे छा गये;
ऐसे बरसे, ऐसे बरसे, कि, तुम्हारे रूप से, अपने ही घबरा गये।
सुंदर; सलोना मुखड़ा तुम्हारा, नशे से पथरा गया।
बचपन तू नशेबाज बन गया।
छोटे, छोटे बच्चे, नशे में झूम रहे हैं,
कल तक जहां विद्यालय था, मदिरालय का वहाँ बना स्थान;
पोथी पुस्तक, पीछे रह गये; गंदी, अश्लील, किताबों ने ले लिया स्थान।
नशे की तेज धूप में, जीवन के अंधकार का आलम क्या होगा;
अभी तो बचपन ही है, पचपन के पार का हाल क्या होगा।
देखो, नशे के सौदागरों की आज बन आई है,
लड़कपन, अब तो  तू   हो जा सावधान;
देख, बचपन बना नशे का आज शैदाई है;
जवानी, तू लड़कपन को संभाल;
कहीं वह बचपन की हरकतों की भी, न बन जाये परछाई;
आखिर, उसमे भी गर्मी आई है।
बुढ़ापे, तू तो न आँख चुरा;
दे, तौफीक इनको, नशा तो हरजाई है।
जीवन की इससे, हो रही तबाही है।
बिक रहा है बाग़बान देश का,
अब बेर नही, धतूरे का बीज बोयेंगे;
अब, इस चमन के फूल,
अपनी अपनी किस्मत पर रोयेंगे।
जवान नस्ल इस देश की, कैसे पकड़े तरक्की की परवाज;
देश के सरमायेदारों ने नशा करा दिया,
और लगा दी महँगाई की आग।
नशा ही नशा,… ऐसा असर,… ऐसा कहर
अब होती नहीं परवाज।

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