साठ के पार

साठ के पार

साठ के ऊपर हो चले हैं, कशमकश में इनकी कहानी है,
सोलह की उम्र की खून की गर्मी खत्म हो चली,
वह तो बात, पुरानी है।
आज का साठ बीते दिनों का, पुराना दौर था,
नशे का नहीं, काम का कर्मठ पुरजोर था,
उसने साठ तक तो अपना घर बसाया,
आज सोलह, अपने साठ पर, क्या गुल खिलायेगा,
आगाज़ जिसका नशे से हो वह क्या घर बसायेगा।
बीते दिनों के साठ पे ग्रहण नशे कर लग गया है
दोनों ही हैं नशे में, नशा दोनों को ठग रहा है।
नशा जवानी का है इक ऐश का सामान,
बुढ़ापा ले रहा नशा, हो के जिंदगी से परेशान।
मासूम जिंदगी से, क्यों बार बार खेलते हो,
जिंदगी की उसकी तार को, क्यों बार बार छेड़ते हो।
माना कि, साठ के उसूलों  में  दम नहीं रहा है,
मगर, तजुर्बा साठ का, सोलह को कहां है।
नई पीढ़ी की आग है, बुढ़ापा झेल नहीं पाता, इसलिये…;
पीता वह शराब है, और उसे कुछ समझ नहीं आता।
उम्र साठ के वह पार कर गये,
लम्हे वह बीते लम्हे, पुराने हो गये,
यार सारे कुछ मर गये, कुछ बेगाने हो गये।
अब इस अकेलेपन को वह सह नहीं पाता, इसलिये;
पीता वह शराब है, और उसे कुछ समझ नहीं आता।
अगर छेड़ना चाहो पुराने सितार को,
पहले साफ करें, फिर ठीक करें उसके तार को,
फिर तार की तान को, इक नई आगाज़ दें,
मिला दे अपने सुरों को, इक नई आवाज़ दें।
नशा बुरी चीज है, उन तारों को काट दें,
फिर अपनी मीठी वाणी से, इक नई तार दें।
और फिर पुराने साज को, इक नया अंजाम दें,
अपने शराबी बुजुर्ग को, तू जीवन दान दे।

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