मुक्तक

आग में रंग बदलता है ,ये दिल तो रोज जलता है |
ये दिल मेरा है सोने का जो जलकर भी न जलता है ||
आज मै पूछता उनसे वो मुझसे दूर है कैसे ?
दीप उनका जलाया था जो दिल में अब भी जलता है ||

किसी का प्यार जलता है किसी का ख्वाब फलता है |
कोई साँचे में ढलता है कोई साँचा बदलता है ||
ये कैसा है भरम दिल का जो दिल दिल को न पहचाने ?
जो दिल दिल को जलाता है उसी पर ये मचलता है ||

गरूरे हुस्न में आकर जो खुलकर बडबडाते है |
आँखों के रास्ते से जो दिल में उतर जाते हैं ||
जो खुद बहके हुए से है दिखाते है वही गुस्सा |
दिल की बात जो पूँछो शराफत को सिखाते है ||

अकेले में कभी तो हम खुलकर खिलखिलाते है |
भीड़ में भी अकेले हो के खुलकर गीत गाते है ||
ये मेरी नीचता या फिर बहे उदगार है दिल के ।
ऋचाएं प्रेम की लिखकर भी हम पगले कहाते है ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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