ब्यथा को भी

ब्यथा को भी आज तू प्रेम पुरस्कार दे |
कंटकों की झाड़ियो को भी लिपटकर प्यार दे ||
स्वप्न तेरा झूठ की बुनियाद पर ही गढ़ गया |
उस स्वप्न को भी स्वर्ण नगरी का तू उपहार दे ||

सप्त स्वर की साधना में प्रेम स्वर झंकार दे |
मिलन अथवा विरह दोनों को ही तू सत्कार दे ||
नयन सर की मार से मुर्क्षित हुए जो विपुल योद्धा |
पवन सुत का ध्यान कर संजीवनी का सार दे ||

अनाड़ी है खिलाडी जो उसे तू तलवार दे |
तू निहत्था हो के खेले लहू की फिर धार दे ||
मरता है जो क्षण क्षण पर वही फिर अमर बनता है |
अमर रस पान करके मौत को ललकार दे ||

महल उनका मोम का है शीत की फुहार दे |
आग को तो दूर रखना ठण्ड का संसार दे ||
कमल नाल तन्तुओ से बधते नहीं गजराज हैं |
तन्तुओ की लाज रख ले तन्तु को आधार दे ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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