बदतर जिंदगानी

बदतर जिंदगानी

बद से बदतर हुई, जिंदगानी आपकी;
ख़ाक मे मिल कर रह गई, सारी जवानी आपकी।
गिला किस किस से करोगी ?
नशा आज बनकर रह गई, परेशानी आपकी।
नशे में न कोई दोस्त, न कोई हमदर्द है तुम्हारा;
तुम्हारी नसों  मे  उतरता गया,
होता गया जीवन नर्क तुम्हारा।
तुम तो गाफिल ही रही नशे म उल्फत को ढूँढ़ने  मे ;
नशे ने सारा छीन लिया, हुस्नो-बदन तुम्हारा।
आज जिंदा लाश बन कर रह गई है,
यह कोमलांगी जवानी आपकी।
इक तो था हुस्न तुम्हारा,
दूजा शबाब रंग पर आ गया;
नशे ने की छेड़खानी,
तन बदन लड़खड़ा गया।
जवानी की हर मनमानी, रूप से दामन छुड़ाती रही;
आज दगा दे गई,
जवानी की हर निशानी आपकी।
खुदा जब हुस्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है;
हुस्न जब जाम उठाले, शरारत आ ही जाती है;
शरारत रंग पर जब आये,
रंग कयामत ले आती है;
कयामत जब अस्मत पर आ जाये,
मौत भी  काँप  जाती है।
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  1. gopi 24/10/2013

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