गजल

हम तो उनको भुला रहें हैं |
वो याद क्यूँ आये जा रहें हैं ||

गिनीं नहीं जो रातें जागे |
वो शाम से सोनें जा रहें हैं ||

समाया आखों में है समन्दर |
बरसात बनकर बहा रहें है ||

आंशुओ से है जो न बुझती |
हम आग ऐसी जला रहे हैं ||

रात रात भर जाग जाग कर |
गीत विरह के बना रहें हैं ||

फकीरों को क्या मिले सितारे |
फिर उनको क्यूँ बुला रहे हैं ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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