पाकीज़गी ठेंगे पे

पाकीज़गी ठेंगे पे

ज़माने की पाकीज़गी हवा हो गई, शर्म नंगी, बेबस हया हो गई।
किस तहज़ीब की बात करते हैं आप,
पुरखों की कमाई, दौलते-हया, सुपुर्दे-ख़ाक हो गई।
आज नई पीढ़ी के आगे, पीढ़ी पुरानी, चलती फिरती मज़ार हो गई।
सिर्फ दुआ-सलाम तक ही रह गई मर्या  इसकी,
नसीहतें उनकी, रिवाज़े-खि़लाफ हो गई।
ज़माने की पाकीज़गी हवा हो गई।
छोटा बड़ा, या छोटी बड़ी, के बीच का लिहाज़्  नहीं,
दीवारें उनके बीच की दरकिनार हो गई।
ठोकरें खा रही है इज्ज़त सड़कों पर, शर्म, इज्ज़त की सरहद पार कर गई।
कौन मां  बाप, कौन औलाद, लहू, मज़हब से भी इनकी तकरार हो गई।
अगर दुपट्टा उतर गया है सिर से, तो पगड़ी की भी शान, ज़मींदोज़ हो गई।
देखो, वह आ रहे हैं शहज़ादे, नशे  में  धुत्त, आ रही है शहज़ादी भी नशे  में ,
जवानी पूरी तरह चढ़ी भी नहीं, इज्ज़त अब भी है खतरे में।
सामने  कौन  सोया है; माँ बाप; बहन भाई; या भाभी,
यह शहज़ादा उन्ही पर गिर पड़ा है।
बस अध नंगी अपनी लाश लिये,
शहज़ादी का दुपट्टा किधर है, सलवार किधर है,
किसके बदन पर उसका चोला गिरा है,
जिस पर गिरा है, शायद वहां भी कोई सोया है।
फिर भी आंखों में इनकी तरेर इतनी, मज़ाल इन ही की बड़ी है,
कसूर इनका नहीं, यह नई तहज़ीब की ही कड़ी है,
जवान  हैं  ये, यही इनके जीने की घड़ी है।
बूढ़े बुढि़या की लकड़ी की छड़ी, वह किनारे ही पड़ी है,
इनकी छड़ी ये बन जाये, जो बीते जमाने से चली थी,
आज के इस रंगीन फिज़ा में फना हो गई।
बेबस हया रो रही, अपनी इज़्ज़तदारी पर,

आज जवां बेच खुद्दारी अपनी,
कर रहा मौज उसकी लाचारी और,हँस रहा अपनी नंगी शर्म-सारी पर।

आज शर्म नंगी, बेबस हया हो गई,
जमाने की पाकीज़गी हवा हो गई।
माँ-बाप भी रिश्तों को कैसी हवा देने लगे,
निचोड़ के सब रिश्ते, हिसाब खून का मांगने लगे।
करते हैं पैदा पहले, देते हैं लाड़-प्यार बहुत,
फिर पालने पोसने का भी खर्च मांगने लगे।
किस कर्म-धर्म पर यकीन करे कोई; जब,
जलता हुआ हवन भी चिता बनने लगे।
आज शर्म ज़हर, हया मज़ार बन गई,
जमाने की पाकीज़गी हवा हो गई।

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