सूर्य-ग्रहण

सूर्य-ग्रहण

करता हूँ इक नौ जवां की, दिल सोज़ दास्तां बयान,
नशे से उसकी जिंदगी कैसे हुई तमाम;
बचपन से लड़कपन तक वह होनहार था,
पढ़ने में अव्वल, होशियार, खुशमिज़ाज़ था।
जिंदगी को फतह करने का जोशो-ज़माल था,
घर का सूरज था, तेज उसका जल्लो-जलाल था।
लड़कपन ने करवट बदली, जवानी ले आई,
साथ अपने जीने के कई बहाने ले आई।
बहाने की इस फ़ेहरिस्त में, इक ऐसा नाम था,
कहने को वह नशा, पर, मौत का पैगाम था।
हंसती खेलती जिंदगी थी, सब दोस्त यार थे,
बचपन से उसके साथ, वे उसके हमराज थे।
जवानी ने उसके दोस्त बदले,

बदले  में  जो आये वे नशेबाज थे,
दौलत  में  यह कम नही था, वह दौलत के यार थे।
नशे से उसकी शुरूआत, बड़ा हसीन वाकि़या था,
नशे का पहला कश, बड़ा पुरजोर था,
पेश करने वाला हाथ, इक कमसिन, नाजुक, अदबी, हाथों का जोर था।
शोख नज़रों से जो पेश किया, इशारे के साथ  में ,
सिगरेट नहीं वह नशे का जहर था, नाज़नीन के हाथ  में  ।
यहाँ से जो नशे का सफर शुरू हुआ,
अंत का सामना करने के, वह काबिल ही नहीं रहा।
नशे मे जो डूबा, डूबता ही गया,
कमसिन नहीं थी वह, ऐश को कैश करने का सामान थी,
चरस,गांजे, कोकीन, की चलती फिरती दुकान थी।
वह अपने को शबाब-ओ-शराब का मंज़र बनाये बैठी थी,
यह अपने नशे में खुद का मज़ार बना बैठा।
इक दिन हौसले का भी फैसला हुआ,

घरवाले चीख उठे हाय क्या हुआ,
अच्छा भला हमारा लाल था, क्या हाल इसका हुआ।
नशे ने उसे इतना निचोड़ा, वह बावरा हो उठा ,
नशे का ग्रहण बड़ा पुरजोर था,
जिस्म की हरकत हो रही थी बंद, समां  बड़ा कमजोर था,
सब हो चुके थे शांत, न कोई शोर था,
नशे के ग्रहण ने घर के सूरज को मौत के अंधेरे  में  ढक लिया,
और नशे ने जिंदगी से कहा…. तख़लिया,.. तख़लिया,… तख़लिया।

Leave a Reply