अर्श से फर्श पर

अर्श से आई थी वह बूंद, शबनम की बूंद;
फूलों ने इस्तकबाल किया, फूलों की गोद में थी वह बूंद ।

एक आंधी ऐसी चली, फिसल गई वह बूंद;
एक कांटे से उलझी, दूजे कांटे से उलझी, उलझती चली गई वह बूंद;
ज़मीं पर गिरी, समा गई ज़मीं पर वह बूंद;
’’निर्भय,निर्मल,शबनम’’, वह बूंद।

ज़माने की नई रौशनी, नये रंग का खुमार ले बैठी,
जवान थी इक नौजवान को दिल दे बैठी।

नए सपने सजाने लगी, इक महल सपनों का बनाने लगी,
भरोसा था अपने साजन पर, मगर जमाने की नीयत समझ न सकी,
हवस की नज़रें समझ न सकी, किस रिश्ते पर भरोसा करे कोई,
’बहन’ शब्द की पाकीज़गी भी जब न रख सके कोई,
इक दिन देर शाम निकली तफरीह के लिए,
इसी ’’शब्द’’ ने उसकी पाकीज़गी के कई चिथड़े किए।

’’गाड़ी में बैठो दीदी, कहां छोड़ दें’’

बाकी दोस्तों ने भी उसका साथ दे दिया बुलाया आओ घर छोड़ दें ,
भाई इज्जत की रुसवाई करेगा वह न जानती थी,
साजन के साथ गाड़ी में जा बैठी वह शबनम वह बूंद।

हैवानियत ने आज हर हद को पार कर दिया,
बैठाया अपनी गाड़ी में और उसकी इज्जत को तार तार कर दिया,
वह कोमल काया, हवस के कांटों का बनी शिकार,
फ़ना हो गई इस दुनिया से, छूटे सपने बीच जीवन के मंझधार।

शबनम की बूंद… पाक साफ, अर्ष से आई थी, आज फर्श पे समा गई वह बूंद।

यह मानसिकता कहां से आई है, इन्सान बना शैदाई है,
हवस की भूख की भी हद है, जवां होने से पहले ही बनते ’’लोफर हैं,
गुण्डों की छाप लिए फिरते हैं, ऐसी जवां नस्ल की हरकत है।

सरकार बेचारी बेबस है, यह उन्ही की करतूतों का फल है।

आज देष के हर कोने नुक्कड़ में, कोई निर्भय, कोई दामिनी हो रही शिकार,
हवस के शिकारी खुले पड़े हैं, सो रही अपनी सरकार।

’’ जब आग लगे तब कुआं खोदे’’
ऐसे कानून के पण्डित बैठे हैं, लिये हाथ में कलम दवात,
जब छोटे बच्चों के ही हाथ में दे दिया इन्टरनेट का हाथ,
क्यों न सीखे ’’गुगल’’ से गुल्ली डंडा और कबडी का नंगा नाच।

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