काई

काई पालने से ही लड़की की उम्र की हर इकाई,
इक काई से डरती है फिसलते देर नहीं लगती ,
हवस ही की फिसलन हैं,
जिंदगानी लड़की की जिस पे फिसलती है।

गलती मेरी नहीं थी ख़ुदा की कसम ,
अनजाने थे रास्ते बहक उठे हैं हम, कुछ लुटी,
कुछ हमने लुटाई, थी अमानत किसी की,
किसी और ने उड़ाई था यह जवानी का फ़ल्सफ़ा,
बचपन में समझ न पाई।

क्यों तुफान जिंदगी में आ गये,
अभी तो अंकुर फूटे भी न थे,
कि लोग मसलने आ गये।
बचपन पे ढा दिये सितम पे सितम,
नये है रास्ते बहक उठे हैं कदम।

मांग में सिंदूर क्यों होता है,… मालूम न था,
जवानी में चढ़ती सीडि़यों के पग कितने होते हैं,
… मालूम न था पहले ही से क्यों दिख गये सिंदूर के रंग,
नये हैं रास्ते बहक उठे हैं कदम।

थी अबोध ,
अब हो रही हूं जवान उम्र का हिसाब नहीं,
न ही दास्तान धड़कनों की होने पाई ज़वान किस किसनें मेरे चिथड़े उतारे,
किस किस ने दिये कितने ज़खम।

जिस कूचे से निकल के आते हैं उसी पे शोले बरसाते हैं ऐसे ये शोहदे हैवानियत के मारे हैं।
बेहोषी मुझ पर छा रही,
मदहोश कोई हो रहा है अस्मत मेरी लुट रही,
देश सो रहा है वह कुआंरी है ’ रेप ’ हो गया है।

आंकड़े अनगिनत है ,
मगर कम लिख रहा है बच्चियां इतनी हो रही शिकार,
शायद बूढ़े अख़बारों को कम दिख रहा है।
जवां अख़बार है उसे तजु़र्बा ही कहां है देष के सिरमायेदारों ने उन्हे जो दबा रखा है
खबर अच्छी है पेपर बिक रहा है सुबह होती हैं ,
फिर शाम, फिर रात होती है अस्मत कितनी ही नीलाम होती है,
देष की जनता है सिर्फ खबर पढ़ती है।

मेरी भी अब सुबह होती है,
आज मेरी अस्मत फिर किसी चर्चे पर दिखती है
जिंदगी इसी तरह जवान होने का दम भरती है
शायद ऐसे ही जिंदगानी होती है खतम ,
नये रास्ते हैं बहक उठे हैं कदम।

Leave a Reply