मधु-बावरे

मैं को मय मिली, मयख़ाना आबाद हुआ,
साकी को ज़न्नत मिली, घर अपना बर्बाद हुआ।
मधुशाला में मधुबाला के मधुकलश में, ये नहीं कोई तेरी मीता
यह तो है मीत मदिरा का, मदिरा का है नतीजा;
नशा नशा
और.. नशा,
नहीं किसी को इसने बख्शा, नहीं कोई इससे है जीता।
जननी इसकी अंगूर की बेटी “मधुद्राक्षिका”
कर्मो से जो बनी मधुचण्डिका , मधुराक्षिका,
है ये अंगूर की बेटी “मधुद्राक्षिका”।
साकी की गोद में क्या ढूंढ़ रहा है होके यूं मदहोश,
जाम नहीं तेरी जिंदगी की शाम है ये,
इसके हर रंग के पीछे इसका बदरंग छिपा,
इसके हर छलकते छलावे से हर शख्स जहां तहां बिका;
है ये अंगूर की बेटी “मधुद्राक्षिका”।
कभी मधुकलश में मधुबाला संग शोखियां दिखाती है
कभी साकी संग अठखेलियां कर ज़ामों-ज़हर पिलाती हैं
नशा काम है इसका, नशे का रूप दिखाती है।
नया युग है,
है नया जमाना,
नये जमाने में इसने कई अपने दोस्त बना लिये,
एल एस डी कोकीन ब्राउन शुगर,
इनके खजाने के कई नुक्कड़ बना दिये।
पहले था मय का नशा,
अब कश लगाने के भी ठिकाने बना दिये।
नशा नशा और नशा,
दीवानगी नशे की कहिये या,
मधु-बावरे इनको,
सबकुछ लुटा देते हैं लत्त पड़ जाये जिसको।
इस मय कश की जुगलबंदी में ग्रस्त हो रहा हिन्दुस्तान सारा,
मय की मस्ती, कश की कश्ती का न रहा कोई खेवनहारा,
सिरमायेदारों ने इस देश के, बो दिये बीज धतूरे के,
आज नशे में भटक रहा देश सारा।

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  1. admin चन्द्र भूषण सिंह 20/10/2013