शहंशाहों की विरासत मालूम पडती वो मंडी

HP0001
शहंशाहों की विरासत मालूम पड़ती आज वो मंडी
होता था अक्सर जहाँ रोज आना जाना |

इक रोज हम भी शाही सूट में सज धज कर मंडी जा पहुँचे
इस रेहड़ी उस रेहड़ी हर रेहड़ी का चक्कर लगाया
कुछ खरीद संकू, परंतु
सब कुछ हद से बाहर पाया |

अचानक इक गूँगी सब्जी बोली
बाबू जी क्यूँ हो हमसे खफ़ा
ना ढाओ यूँ जफ़ा ,
आई थी हम तो करने दुनिया का भला |

महँगाई की ऐसी मार पड़ी है
मौसम बिन मौसम सब महंगा है प्यारी |
कृषि प्रधान भारत!
आधा भारत फिर भी भूखा है,
था गरीबों का मसीहा जो कभी
वो आलू भी आज महँगा है |

Leave a Reply